राची, झारखण्ड | मार्च | 21, 2024 ::
होली जलाने के बाद लोग गीत गाते, बजाते, झूमते, नाचते हैं, परंतु स्थूल नाच और गान तभी चरितार्थ होगा जब मन बुराईयों और चिंता से मुक्त और आनदित होगा। होली जलाने का अर्थ पिछले वर्ष की कटू और तीखी स्मृतियों को जलाना और हसते-खेलते नये
वर्ष का आवाहन करना है। ये उदगार यहॉ चौधरी बगान, हरमू रोड स्थित ब्रह्माकुमारी संस्थान में डा० अभिषेक रामाधीन, आई एम ए उपाध्यक्ष तथा पुर्व फिक्की महासचिव ने होली मिलन समारोह में अभिव्यक्त किये। उन्होंने कहा जैसे भुना हुआ बीज नए फल की
उत्पत्ति नहीं कर सकता वैसे ही ज्ञान योग युक्त अवस्था में किया गया कर्म विकर्म का रूप नहीं ले सकता। उन्होंने कहा भारत में वर्ष फाल्गुन की पुर्णिमा को समाप्त होता है। पुराने वर्ष के अन्त में इस त्योहार का मनाया जाना इस रहस्य का परिचायक है कि यह पर्व
कलियुग के अन्त में मनाया गया जिसके बाद सतयुग सुख-शांति के दिन शुरू हुए।
डाo सतीश शर्मा, कैंसर विशेषज्ञ ने कहा इस संसार में दो ही रंग है – ” एक माया और दूसरा ईश्वर का रंग’। इस रंग मंच पर हर मनुष्य इन दोनो में से एक न रंग में तो रंगता ही है। ईश्वरीय रंग में रंगना ही श्रेष्ठ होली मनाना है। क्योंकि इस रंग मे रंगा हुआ मनुष्य ही योगी है। माया के रंग में रंगा हुआ मनुष्य ही भोगी है। अब आत्मा चोली को ज्ञान से रंग कर परमात्मा से मंगल मिलन मनाना चाहिए।
कुमुद झा, समाजसेवी ने सृष्टि क्तो परमात्मा अत्याचार रूपी हिरण्यकश्यप तथा अशांति व भय रूपी होलिका के चंगुल से प्रह्लाद आर्थात प्रभु संतान समस्त आत्माओं मुक्त करते हैं।
अपने विचार व्यक्त करते हुए सज्जन केडिया, योगा शिक्षक ने कहा वास्तव
योगाग्नि प्रज्वलित करने से ही हमारी पूरानी कट् स्मृतियों मिट जाती है। होलिका के गोबर और घास-फूस को अग्नि की ज्वाला में जलाना वास्तव में मन की ऊबड़-खार दूषित वृतियों को योगाग्न द्वारा भस्मसात करने की प्रेरणा देता है। गेहूँ और जौ को भूनने का अर्थ अपने पुराने दृषित संस्कारों को जलाने से है।
अ्रवण कुमार, समाजसेवी ने कहा अज तक दुसरों पर रंग डालने तथा परिचित अपरिति सभी से प्रेम भाव से मिलने की जो रीति है उसका शुरू में यही रूप था कि परमात्मा से ज्ञान प्राप्त करके मनुष्यों ने ज्ञान पिचकारी से एक दूसरे की आत्मा रूपी चोली को था तथा मन मुटाव त्याग कर मंगल मिलन तभी मना सकते हैं जब ज्ञान अबीर में रंगे और पुराने आचारों, विचारों व मनोविकारों को योग की अग्नि का इधन बना दें।
केन्द्र संचालिका ब्रह्माकुमारी निर्मला बहन ने इस अवसर पर कहा जो मनुष्य को ज्ञान के रंग में रंगता है और सच्चा बैष्णव बनता है। उसे बैकुण्ठ में सुखद झुलते हुए श्रीकृष्ण के दर्शण होते ही हैं। उसकी ऑख इस कलियुरगी दुनिया से हट जा है तथा उसे विषय विकार फिर अपनी ओर आकर्षित नहीं करते। होली का उत्सव उसके लिए भल उत्सव नहीं बल्कि ज्ञान मंथन उत्सव बन जाता है। ज्ञानी मनुष्य अपने संग से दूसरों पर भी ज्ञान का रंग चढ़ाता है। उनकी आत्मा रूपी चोली को भी परमात्मा की लाली
में लाल करता है।




