राची, झारखण्ड | मई | 27, 2025 ::
सेंटर फॉर एनवायरनमेंट एंड एनर्जी डेवलपमेंट (सीड) द्वारा आज एक स्टेकहोल्डर कंसल्टेशन का आयोजन किया गया, जिसका उद्देश्य क्लाइमेट चेंज एवं अत्यधिक गर्मी (हीटवेव) की बढ़ती घटनाओं पर डेटा-आधारित शोध एवं क्षेत्र-विशिष्ट एक्शन प्लान बनाने की प्रक्रिया को बढ़ावा देना था। कार्यक्रम में सीड द्वारा तैयार एक शोधपरक रिपोर्ट ‘स्कॉचिंग रियलिटी राइजिंग हीटवेव्स इन इंडिया द केस ऑफ झारखंड’ जारी की गई। कार्यक्रम में वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग, भारतीय मौसम विज्ञान केंद्र (रांची) के वरिष्ठ अधिकारियों के अलावा राज्य के प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों, सार्वजनिक स्वास्थ्य, क्लाइमेट रेसिलिएस एवं कम्युनिटी डेवलपमेंट आदि विषयों से जुड़े सिविल सोसाइटी संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
सीड की रिपोर्ट में गत 35 वर्षों (1990 से 2024) के हीटवेव (उष्ण लहर) के ट्रेंडस का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है, जो भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों पर आधारित है। रिपोर्ट के अनुसार झारखंड में इस अवधि में कुल 590 हीटवेव के दिन आये, जो राज्य में हीटवेव की आवृत्ति में 300% तक की वृद्धि को दर्शाता है। सीजनल ट्रेंड से पता चलता है कि मई में सर्वाधिक (275 दिन), अप्रैल (183) और जून (132) में हीटवेव के दिन रिकॉर्ड हुए। क्षेत्रीय या जिले स्तर पर गढ़वा, पलामू, लातेहार और सिमडेगा जैसे पश्चिमी और मध्य जिले सबसे अधिक प्रभावित रहे, जबकि गोड्डा और साहिबगंज जैसे पूर्वी जिलों में तुलनात्मक कम हीटवेव के दिन आये। यह विश्लेषण राज्य में अत्यधिक तापमान की गंभीरता और लगातार बढ़ते खतरे को उजागर करता है।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए श्री ए.के. रस्तोगी, आईएफएस (सेवानिवृत्त), अध्यक्ष, टास्क फोर्स-सस्टेनेबल जस्ट ट्रांजिशन (झारखंड सरकार) ने कहा कि क्लाइमेट चेंज के दुष्प्रभावों से कोई समुदाय या क्षेत्र अछूता नहीं रहा। अत्यधिक गर्मी का सबसे अधिक प्रभाव गरीब, वंचित और असंगठित क्षेत्र के कामगारों पर पड़ता है। उन्होंने बेस्ट प्रक्टिसेस और केस स्टडीज़ का उपयोग करते हुए सबसे संवेदनशील जिलों के लिए एक्शन प्लान बनाने और स्वास्थ्य एवं आर्थिक नुकसान से संबंधित अधिकाधिक अध्ययन करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
इस अवसर पर श्री रवि रंजन, आईएफएस, एडिशनल प्रिंसिपल चीफ कंज़र्वेटर ऑफ़ फॉरेस्ट कैम्पा एवं स्टेट नोडल ऑफिसर फॉर क्लाइमेट चेंज (झारखंड सरकार) ने हीटवेव के पर्यावरणीय और आर्थिक प्रभावों का मुकाबला करने के लिए जलवायु अनुकूलन रणनीतियों की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने झारखंड स्टेट क्लाइमेट एक्शन प्लान के अद्यतन प्रारूप में चिन्हित दस प्राथमिक क्षेत्रों पर प्रकाश डाला और शॉर्ट टर्म इमरजेंसी रेस्पॉन्स एवं लॉन्ग टर्म रेसिलिएस प्लानिंग की रूपरेखा पर चर्चा की।
कार्यक्रम एवं रिपोर्ट के व्यापक उद्देश्यों को साझा करते हुए सीड के सीईओ श्री रमापति कुमार ने कहा कि क्लाइमेट एक्शन को प्रभावी बनाने में साइंटिफिक डेटा, लोकल नॉलेज और समुदाय के अनुभवों को एक मंच पर लाना आवश्यक
है। उन्होंने विभिन्न सरकारी विभागों एवं एजेंसियों तथा अन्य स्टेकहोल्डर्स बीच कन्वर्जेन्स एवं समन्वय पर बल दिया, जिससे समावेशी एवं पर्यावरण हितेषी विकास की राह सुगम हो।
कार्यक्रम में डॉ. अभिषेक आनंद, साइंटिस्ट एवं डायरेक्टर, मौसम विज्ञान केंद्र, रांची ने बताया कि हीटवेव की आवृत्ति में हो रही वृद्धि वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित ट्रेंड है, जो वैश्विक जलवायु परिवर्तन के स्थानीय प्रभाव को इंगित करती है। उन्होंने वैज्ञानिक शोध-अध्ययन, नीति-निर्माण और सामुदायिक क्रियान्वयन की आवश्यकता को रेखांकित किया।
डॉ. गीता साइम्स, पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट ने कहा कि हीटवेव अब सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन रहा है, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों के कमजोर और वंचित समुदायों के लिए। उन्होंने बताया कि बढ़ते तापमान के कारण अत्यधिक गर्मी और लू से बीमारियां एवं मृत्यु दर बढ़ रही है और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर लगातार दबाव बढ़ रहा है।
कंसल्टेशन में कई विचारणीय बिंदु समाने आये जैसे, हीटवेव से निपटने के लिए विकेंद्रीकृत, समावेशी और वैज्ञानिक रणनीतियों को अपनाना, लोकल हीट एक्शन प्लान्स बनाना, अर्बन एवं रूरल कूलिंग प्लान बनाना, स्वास्थ्य सेवा ढांचे को मजबूत करना, सार्वजनिक स्थलों पर शेड एवं ग्रीन कवर का विस्तार, विद्युत आपूर्ति सुविधा बढ़ाना, और सरकारी विभागों, शैक्षणिक संस्थाओं, सामुदायिक संगठनों और सिविल सोसाइटी के बीच समन्वय विकसित करना, आदि।




