आधुनिकता और सभ्यता :: गुड़िया झा
समय के साथ सबकुछ बदलता है। पुरानी कार्य पद्धति की जगह नयी तकनीक से कार्य करना, आधुनिक मशीनें, रहन-सहन के स्तर में बदलाव, जीने के तौर तरीके आदि। वो कहते हैं ना कि अति किसी भी चीज की अच्छी नहीं होती है। कहने का आशय यह है कि हमारी युवा पीढ़ी कई बार स्वतंत्रता का गलत उपयोग करती है और भ्रमित भी हो जाती है। शिक्षा के नये-नये ज्ञान उन्हें इंटरनेट के माध्यम से प्राप्त हो ही जाते हैं। जितना महत्व शिक्षा का है उतना ही महत्व व्यवहारिकता का भी है। इसके लिए घर के बड़े,अच्छे लोगों की संगति और प्रेरणा दायक किताबों का अध्ययन भी आवश्यक है। हमारे देश की शिक्षा नीति में भी ऐसे किताबों को कोर्स के रूप में शामिल करने से बहुत ही लाभ हो सकता है।
हमारी भारतीय संस्कृति की अनेक विशेषताएं हैं। कई लोग अपनी परम्पराओं का निर्वाहन करते हुए आगे बढ़ रहे हैं। कुछ सामाजिक रीतियां ऐसी भी होती हैं, जो युवाओं को भ्रमित होने से रोकती हैं।इसलिए हमारी भी यह जिम्मेदारी है कि हम इन रीतियों के प्रति खुद भी जागरूक रहें और युवाओं को भी इसके लिए प्रोत्साहित करें।
हाल ही में दिल्ली में हुए श्रद्धा हत्याकांड ने यह साबित कर दिया है कि हमारे कुछ सामाजिक बंधन बुरे नहीं हैं।
बच्चों को अक्सर अपने परिवार के सदस्यों से मिलते रहने और अपनी परम्पराओं को बनाये रखने से उनमें विशेष लगाव उत्पन्न होता है। हर किसी को अपनी जिंदगी जीने का पूर्ण अधिकार है। लेकिन उन अधिकारों का गलत उपयोग नहीं हो उसका भी ध्यान रखा जाना उतना ही आवश्यक है।
समय के अभाव ने एक दूसरे की बातों को जानने पर भी रोक लगा दी है। हमारे लिए यह अति आवश्यक भी है कि एक अभिभावक के साथ अच्छे दोस्त भी बनते हुए जब हम बच्चों से संवाद करेंगे, तो उनके विचारों को भी समझने में आसानी होगी।
बड़े होते बच्चे के साथ हमें भी अपने व्यवहार में बदलाव लाने की जरूरत है। आक्रोश या दबाव में किसी को बदला नहीं जा सकता। एक दूसरे की नकल करने में भी युवा अपनी शान समझते हैं। किसी ने ठीक ही कहा है कि गलत दिशा में चल रही भीड़ के साथ चलने से कहीं ज्यादा अच्छा है सही दिशा में अकेले चलना। बच्चे देश का भविष्य होते हैं। जब कभी लगे कि शायद हमसे भी समस्या का समाधान नहीं हो रहा है, तो घर के बुजुर्ग या मनोवैज्ञानिकों की मदद बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।

