रांची, झारखण्ड | जून | 04, 2020 :: प्रकृति भी हमसे उतना ही स्नेह, प्रेम और बचाव चाहती है, जितना हम प्रकृति से उम्मीद करते हैं। इसका जीता जागता उदाहरण है इस कोरोना जैसी महामारी की अवधि में लंबे लॉक डाउन के कारण गाड़ी, मोटरें, कारखाने आदि के बंद होने के कारण प्रकृति की मनोरमा दृश्य पर जो अनुकूल असर हुआ है उसे हम सभी देखते और महसूस भी करते हैं। हरे भरे पेड़, पौधे, पहाड़, तालाब, नदियों ने अपनी सुंदरता के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया है कि उनके पास बोलने के लिए जुबाम नहीं हैं तो क्या हुआ, वे भी हमसे अपने लिए सुरक्षा की उम्मीद करती हैं।
1, शोषण नहीं, सुरक्षा हो।
जिस प्रकार से हम अपनी सुरक्षा के प्रति जागरूक रहते हैं। यहां तक कि पूरी सतर्कता के साथ अपने तथा परिवार की सुरक्षा की पूर्ण जिम्मेदारी अपने ऊपर लेते है। ठीक उसी प्रकार से हमें प्रकृति की सुरक्षा भी अपनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी समझनी होगी। आस पास के पेड़ पौधों को काटे नहीं बल्कि उनकी रखवाली खुद करें और दूसरों से भी ऐसा करने की अपील करें। आस पास पेड़ पौधे हरे भरे रहेंगे, तो घर का वातावरण भी शुद्ध होगा।बारिश के दिनों में जो पानी अनावश्यक रूप से बह कर नाले में चला जाता है उसे संरक्षण कर पौधों की सिंचाई के उपयोग में लायें। मिट्टी के अंदर पानी जाने से गर्मियों के मौसम में जो हमें पानी की भारी किल्लत झेलनी पड़ती है, उससे बहुत सहायता मिलेगी।पौधों को हम जितनी लगन से देखभाल करेंगे, वे भी समय आने पर मीठे फल हमें देंगे।
हम जो खुले वातावरण में शुद्ध हवा लेते हैं इन्हीं पौधों की देन है। इसलिए जब भी मौका मिले खुलकर प्रकृति के साथ समय बितायें। निश्चय ही हम पायेंगे कि जितना सुकून हमें पंखे और एयरकंडिशन में रहने से नहीं मिलता है, उतना सुकून हमें थोड़ी देर प्रकृति के साथ समय बिताने पर ही मिलता है।
2, पेड़ों की कटाई पर रोक।
आधुनिकता की आड़ में हम इतने स्वार्थी हो गये हैं कि कभी कभी अपने रहन सहन के स्तर को ऊंचा उठाने और दिखावे के लिए हरे भरे पेड़ों को काट कर बड़ी बड़ी इमारतें खड़ी करने में लगे हैं। हमें इस पर अंकुश लगाना होगा। क्योकि इसके दुष्परिणाम भी देखने को मिलते हैं। इतना ही नहीं पेड़ों से जो सूखे पत्ते झर कर जब नींचे गिरते हैं, तो हम उसे भी जला देते हैं। जिससे हवा में प्रदूषण की मात्रा बढ़ती है। सूखे पत्ते को खाद के रूप में उपयोग कर हमें इसका बचाव करना होगा।
प्लास्टिक पर भी रोक लगाने की जरुरत है। क्योंकि प्लास्टिक मिट्टी में गलता नहीं है। यह मिट्टी में मिलकर उसे और भी ज्यादा दूषित कर देता है। इसलिए हमें हमेशा कपड़े के थैले पर ध्यान देना होगा।
इसी प्रकार प्रकृति को बचाने के लिए उन मोटर गाड़ियों का कम से कम उयोग करना चाहिए जिनसे अधिक मात्रा में धुआं निकलता है। इससे पेड़ों के साथ साथ मनुष्य की जान को भी खतरा बना रहता है।
प्रकृति हमसे लेती नहीं, बल्कि हमेशा देती है। ऐसे में हमारा भी इनके प्रति कुछ कर्तव्य है। जिससे इनकी सुरक्षा होती रहे और मानवीय जीवन में इनकी भूमिका हमेशा ही सर्वश्रेष्ठ रहे। हम और प्रकृति दोनो एक दूसरे के पूरक हैं।


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