मेनोपॉज यानी रजोनिवृत्ति कोई बीमारी नहीं, बल्कि महिलाओं के जीवन का एक प्राकृतिक चरण है।
रजोनिवृत्ति वह प्राकृतिक अवस्था है जिसमें महिला के मासिक धर्म (पीरियड्स) स्थायी रूप से बंद हो जाते हैं। सामान्यतः यह 45–55 वर्ष की आयु के बीच होती है। इस दौरान शरीर में विशेष रूप से एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन हार्मोन का स्तर कम हो जाता है, जिससे अनेक शारीरिक और मानसिक परिवर्तन होते हैं।
रजोनिवृत्ति के कारण
• बढ़ती आयु के कारण अंडाशय की कार्यक्षमता कम होना।
• एस्ट्रोजन एवं प्रोजेस्टेरोन हार्मोन में कमी।
• अंडाशय का ऑपरेशन द्वारा हटाया जाना।
• कैंसर उपचार (कीमोथेरेपी या रेडियोथेरेपी)।
• आनुवंशिक (जेनेटिक) कारण।
• धूम्रपान, अत्यधिक तनाव एवं अस्वस्थ जीवनशैली।
रजोनिवृत्ति के लक्षण
• मासिक धर्म का अनियमित होना और बंद हो जाना।
• अचानक शरीर में गर्मी लगना।
• रात में अत्यधिक पसीना आना।
• नींद न आना।
• चिड़चिड़ापन, चिंता एवं अवसाद।
• थकान और कमजोरी।
• जोड़ों एवं मांसपेशियों में दर्द।
• वजन बढ़ना।
• योनि में सूखापन।
• हड्डियों का कमजोर होना (ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा)।
• ध्यान एवं स्मरण शक्ति में कमी।
नियमित योगासन, प्राणायाम, ध्यान, योग निद्रा, संतुलित आहार और स्वस्थ जीवनशैली अपनाने से इसके अधिकांश लक्षणों को प्रभावी रूप से नियंत्रित किया जा सकता है तथा शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाया जा सकता है।
वैज्ञानिक आधार
नियमित योगाभ्यास से रजोनिवृत्ति के लक्षणों जैसे हॉट फ्लैश, तनाव, चिंता, अवसाद, अनिद्रा तथा थकान में कमी देखी गई है।
प्राणायाम और ध्यान स्वायत्त तंत्रिका तंत्र को संतुलित करते हैं, जिससे मानसिक शांति, भावनात्मक स्थिरता और तनाव नियंत्रण में सहायता मिलती है।
योग निद्रा और ध्यान से नींद की गुणवत्ता में सुधार तथा मानसिक तनाव में कमी आती है।
नियमित योगाभ्यास से लचीलापन, मांसपेशियों की शक्ति, संतुलन और जीवन की गुणवत्ता में सुधार होता है।
कुछ शोधों के अनुसार योग तनाव हार्मोन कॉर्टिसोल के स्तर को कम करने तथा हार्मोनल संतुलन बनाए रखने में सहायक हो सकता है।
कई वैज्ञानिक अध्ययनों ने निष्कर्ष निकाला है कि योग औषधीय उपचार का विकल्प नहीं, बल्कि एक सुरक्षित एवं प्रभावी पूरक के रूप में रजोनिवृत्ति के प्रबंधन में लाभदायक है।
रजोनिवृत्ति का यौगिक उपचार
1. योगासन
1. ताड़ासन
शरीर को सीधा एवं संतुलित रखने वाला मूल आसन है। यह रीढ़ की हड्डी को सीधा करता है, शरीर की मुद्रा सुधारता है तथा मानसिक स्थिरता और संतुलन बढ़ाता है।
2. वृक्षासन
एक पैर पर संतुलन बनाकर किया जाने वाला आसन। यह एकाग्रता बढ़ाता है, तंत्रिका तंत्र को शांत करता है तथा तनाव और चिंता को कम करने में सहायक होता है।
3. त्रिकोणासन
शरीर के पार्श्व भाग को खींचने वाला आसन। यह कमर और कूल्हों को लचीला बनाता है, रक्त संचार बढ़ाता है तथा रजोनिवृत्ति के दौरान होने वाली जकड़न को कम करता है।
4. भद्रासन (बद्धकोणासन)
दोनों पैरों के तलवों को मिलाकर बैठने का आसन। यह श्रोणि क्षेत्र में रक्त संचार बढ़ाता है, कूल्हों की मांसपेशियों को आराम देता है तथा हार्मोनल संतुलन में सहायक माना जाता है।
5. मार्जरी-व्याघ्रासन
रीढ़ को आगे-पीछे मोड़ने वाला गतिशील आसन। यह रीढ़ की लचक बढ़ाता है, पीठ दर्द कम करता है और तनाव को दूर करने में सहायक होता है।
6. भुजंगासन
छाती को ऊपर उठाकर किया जाने वाला आसन। यह रीढ़ को मजबूत बनाता है, छाती खोलता है, थकान कम करता है तथा मन में ऊर्जा और आत्मविश्वास बढ़ाता है।
7. सेतुबंधासन
शरीर को पुल के समान उठाने वाला आसन। यह रीढ़ और श्रोणि क्षेत्र को मजबूत करता है, थायरॉयड ग्रंथि को सक्रिय करने में सहायक होता है तथा तनाव और चिंता कम करता है।
8. पश्चिमोत्तानासन
आगे की ओर झुकने वाला आसन। यह मन को शांत करता है, अनिद्रा और मानसिक तनाव में लाभदायक है तथा पाचन क्रिया में सुधार करता है।
9. विपरीत करनी
पैरों को दीवार के सहारे ऊपर रखकर किया जाने वाला विश्राम आसन। यह पैरों की थकान दूर करता है, रक्त संचार में सुधार लाता है, तनाव और अनिद्रा कम करता है। यदि उच्च रक्तचाप, ग्लूकोमा, गर्दन की गंभीर समस्या या अन्य चिकित्सीय निषेध हो, तो विशेषज्ञ की सलाह से ही करें।
10. शवासन
पूर्ण विश्राम का आसन। यह शरीर और मन को गहरा आराम देता है, तनाव, चिंता और थकान को कम करता है तथा रजोनिवृत्ति के दौरान मानसिक संतुलन बनाए रखने में अत्यंत लाभकारी है।
1. प्राणायाम
2. नाड़ी शोधन प्राणायाम
इस प्राणायाम में बारी-बारी से दोनों नासिकाओं से श्वास ली और छोड़ी जाती है। यह शरीर की प्राण ऊर्जा का संतुलन बनाए रखता है, तनाव और चिंता को कम करता है तथा मन को शांत करता है।
3. भ्रामरी प्राणायाम
इसमें श्वास छोड़ते समय मधुमक्खी के समान गुंजन (भिनभिनाहट) की ध्वनि की जाती है। यह मानसिक तनाव, चिड़चिड़ापन और अनिद्रा को कम करने में सहायक है तथा मन को गहरी शांति प्रदान करता है।
4. शीतली प्राणायाम
जीभ को नली के समान मोड़कर उससे श्वास अंदर ली जाती है और नाक से बाहर छोड़ी जाती है। यह शरीर को शीतलता प्रदान करता है, शरीर की गर्मी कम करने में सहायक होता है तथा मानसिक शांति देता है।
5. शीतकारी प्राणायाम
दाँतों को हल्का खोलकर उनके बीच से श्वास अंदर ली जाती है और नाक से बाहर छोड़ी जाती है। यह शरीर और मन को शीतलता प्रदान करता है, क्रोध एवं तनाव को कम करता है तथा रजोनिवृत्ति के दौरान होने वाली गर्मी की अनुभूति में लाभदायक है।
6. उज्जायी प्राणायाम
इसमें गले को हल्का संकुचित करके धीमी और गहरी श्वास ली एवं छोड़ी जाती है, जिससे हल्की समुद्र जैसी ध्वनि उत्पन्न होती है। यह तंत्रिका तंत्र को शांत करता है, मन की एकाग्रता बढ़ाता है, तनाव कम करता है तथा अच्छी नींद और मानसिक संतुलन बनाए रखने में सहायक होता है।
1. मुद्राएँ
रजोनिवृत्ति के लिए उपयोगी मुद्राएँ
2. प्राण मुद्रा
इस मुद्रा में अनामिका और कनिष्ठिका (छोटी उंगली) के अग्रभाग को अंगूठे के अग्रभाग से मिलाया जाता है तथा तर्जनी और मध्यमा सीधी रहती हैं। यह शरीर में प्राण ऊर्जा का संचार बढ़ाती है, थकान और कमजोरी कम करती है तथा मानसिक एवं शारीरिक स्फूर्ति प्रदान करती है।
3. अपान मुद्रा
इस मुद्रा में मध्यमा और अनामिका के अग्रभाग को अंगूठे के अग्रभाग से मिलाया जाता है तथा तर्जनी और कनिष्ठिका सीधी रहती हैं। यह शरीर की शुद्धि प्रक्रिया को प्रोत्साहित करती है, श्रोणि क्षेत्र में रक्त संचार बढ़ाती है तथा रजोनिवृत्ति के दौरान होने वाली असुविधाओं को कम करने में सहायक मानी जाती है।
4. ज्ञान मुद्रा
इस मुद्रा में तर्जनी के अग्रभाग को अंगूठे के अग्रभाग से मिलाया जाता है तथा अन्य तीन उंगलियाँ सीधी रहती हैं। यह मन को शांत करती है, एकाग्रता एवं स्मरण शक्ति बढ़ाती है, तनाव, चिंता और अनिद्रा को कम करने में सहायक होती है तथा मानसिक संतुलन बनाए रखने में लाभदायक है।
1. ध्यान
प्रतिदिन 15–20 मिनट ध्यान करने से तनाव, चिंता और मूड में सुधार होता है।
1. योग निद्रा
20–30 मिनट योग निद्रा करने से मानसिक शांति, अच्छी नींद और हार्मोनल संतुलन में सहायता मिलती है।
आहार संबंधी सुझाव
◦ कैल्शियम एवं विटामिन D युक्त भोजन लें।
◦ दूध, दही, तिल, सोयाबीन, हरी पत्तेदार सब्जियाँ शामिल करें।
◦ मौसमी फल एवं साबुत अनाज खाएँ।
◦ पर्याप्त पानी पिएँ।
◦ अत्यधिक चाय, कॉफी, शराब और धूम्रपान से बचें।
◦ संतुलित एवं सात्त्विक आहार अपनाएँ।
जीवनशैली
◦ प्रतिदिन 30–45 मिनट योगाभ्यास।
◦ 7–8 घंटे की पर्याप्त नींद।
◦ तनाव प्रबंधन के लिए ध्यान और प्राणायाम।
◦ नियमित धूप लें और हल्की सैर करें।
सावधानियाँ
• किसी भी नए योग कार्यक्रम को प्रारम्भ करने से पहले चिकित्सक या प्रशिक्षित योग विशेषज्ञ से परामर्श लें।
• यदि उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, गंभीर ऑस्टियोपोरोसिस, स्लिप डिस्क, घुटने या रीढ़ की गंभीर समस्या हो, तो कठिन आसनों से बचें।
• विपरीत करनी या अन्य उल्टे आसन केवल विशेषज्ञ की सलाह पर करें, विशेषकर यदि उच्च रक्तचाप, ग्लूकोमा, या गर्दन की समस्या हो।
• योगाभ्यास हमेशा खाली पेट या भोजन के 3–4 घंटे बाद करें।
• आसनों को अपनी क्षमता के अनुसार करें; अत्यधिक खिंचाव या दर्द होने पर अभ्यास तुरंत रोक दें।
• प्राणायाम करते समय श्वास को जबरदस्ती न रोकें और सहज गति बनाए रखें।
• चक्कर आना, सीने में दर्द, सांस लेने में कठिनाई या किसी अन्य असामान्य लक्षण की स्थिति में अभ्यास रोककर चिकित्सकीय सलाह लें।
• नियमित अभ्यास, संतुलित आहार, पर्याप्त नींद और सकारात्मक जीवनशैली अपनाने से योग के लाभ अधिक प्रभावी होते हैं।
जगदीश सिह
योगा इन्स्ट्रक्टर
आयुष्मान आरोग्य मन्दिर, नेशनल हेल्थ मिशन, स्वास्थ्य विभाग, झारखण्ड सरकार
ईमेल : jagdishranchi@gmail.com




