राची, झारखण्ड | अप्रैल | 19, 2025 ::
जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा संकाय, रांची विश्वविद्यालय के खड़िया विभाग में विभाग के पूर्व शिक्षिका डॉ. रोज केरकेट्टा के निधन पर शोक सभा का आयोजन किया गया. संकाय के शिक्षकों, कर्मचारियों, शोधार्थियों व छात्रों ने डॉ केरकेट्टा की तस्वीर पर माल्यार्पण व पुष्प अर्पित कर भावभीनी श्रद्धांजलि देते हुए नमन किया. अध्यक्षता खड़िया विभाग के विभागाध्यक्ष बन्धु भगत एवं संचालन डॉ मेरी एस सोरेंग ने किया. अध्यक्षता करते हुए बन्धु भगत डॉ रोज दी को याद कर काफी भावुक हो गये, वे अपने आप को रोक नहीं पाये. उनकी अश्रुधारा बह पड़ी.
मौके पर नागपुरी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ उमेश नन्द तिवारी ने कहा कि डॉ रोज केरकेट्टा की लेखनी में आदिवासी संवेदना, सामाजिक न्याय और स्त्री विमर्श का सशक्त समावेश दिखाई देता था। उन्होंने खड़िया भाषा की संरक्षण-यात्रा को एक नई दिशा दी। साथ ही हिंदी साहित्य में भी अपनी अनूठी पहचान स्थापित की। उन्होंने कहा कि रोज दी की कहानियां और कविताएं झारखंड की जीवंत सामाजिक सच्चाइयों और जनविमर्श की गूंज रही हैं। वे सिर्फ साहित्यकार नहीं, बल्कि विचार और संघर्ष की जीती-जागती मिसाल थीं।
हो विभाग की शिक्षिका डॉ दमयन्ती सिंकू ने कहा कि उनका निधन न केवल झारखंड की साहित्यिक धरती, बल्कि देश भर के आदिवासी समाज और विमर्श के लिए एक अपूरणीय क्षति है।
डॉ दिनेश कुमार दिनमणि ने उनके जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वे आने वाली पीढ़ियों के लिए संघर्ष, विचार और अभिव्यक्ति की प्रतीक बनी रहेंगी।
इनके अलावा संकाय के मंडारी विभाग के विभागाध्यक्ष मनय मुण्डा, डॉ सरस्वती गागराई, डॉ बीरेन्द्र कुमार महतो, डॉ तारकेश्वर सिंह मुण्डा, डॉ किशोर सुरीन एवं डॉ बन्दे खलखो ने भी अपने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि डॉ रोज केरकेट्टा का निधन झारखंडी समाज, साहित्य और संस्कृति के लिए अपूरणीय क्षति है.
इस अवसर पर संकाय के अर्चना कुमारी, डॉ अनुराधा मुण्डू, राजकुमार मुर्मू, करम सिंह मुण्डा, शकुंतला बेसरा, अबनेजर टेटे, उषा कुमारी, पंकज कुमार, जलेश्वर महतो, नमिता पूनम, अभिजीत कुमार के अलावा नौ भाषा विभाग के शोधार्थी व छात्र-छात्राएं उपस्थित थे.




