राची, झारखण्ड | फरवरी | 17, 2025 ::
झाड़खंड के वीर सपुत कोल विद्रोह के महानायक बुधु भगत ने अंग्रेज के दमनकारी शासन के विरोध आवाज पुरजोर तरीके से बुलंद किया था। यह बात डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय, रांची मे मनाये जा रहे वीर बुधु भगत के 233 वीं जन्म जयंती समारोह के अवसर पर उपस्थित विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. (डाॅ.) तपन कुमार शाण्डिल्य ने कहा।
कायर्क्रम की शुरूआत बीर बुधु भगत के छायाचित्र पर पुष्पापर्ण एवं दीप प्रज्जवलन के साथ किया गया है। इसके बाद कुड़ुख़ विभाग के छात्र-छात्राओं द्वारा स्वागत गीत गाकर अतिथियों का स्वागत किया गया है। इसके बाद अतिथियों का स्वागत विभाग द्वारा एक नई परंपरा बनाते हुए डाॅ. रामकिशोर भगत द्वारा रचित पुस्तक ‘वीर बुधु भगत जीवन और दशर्न’ भेंट कर किया गया। कायर्क्रम में विषय प्रवेश एवं अतिथियों का स्वागत जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के समन्वयक एवं खोरठा के विभागाध्यक्ष डाॅ. बिनोद कुमार ने स्वागत भाषण देते हुए कहा कि झारखण्ड के इतिहास में बीर बुधु भगत जैसे कई बीरों की विरता का जिक्र न होना बहुत ही दुखत बात है। इसके उपर गहन शोध की आवश्यकता है।
विशिष्ट अतिथि के रूप मे उपस्थित डाॅ. श्यामा प्रसाद विश्वविद्यालय स्थित हिंदी के विभागाध्यक्ष डाॅ. जिंदर सिंह मुंडा ने झारखंडी बीर शहीदों को याद करते हुए कहा कि भारत के परिप्रेक्ष्य में बहुत ही कम गिनी चुनी झारखंडी बीरों को याद करते हैं। जबकि इसकी संख्या काफी है। विशिष्ट अतिथि के रूप मे उपस्थित झारखंडी साहित्यकार महादेव टोप्पो ने झारखण्ड की धरती को बहुत ही अद्भूत बतलाते हुए कहा कि इस कोल विद्रोह में अंग्रेजों द्वारा केवल वीर बुधु भगत ही शहीद नहीं हुए थे बल्कि इनके साथ इनके पूरे परिवारों 100 लोग एक साथ शहीद हुए थे। इस घटना को बहुत बड़ी संघषर्पूण घटना बतलाया। इस अवसर पर पी.पी. के. काॅलेज बुंडु से आये इतिहास विभाग के प्राध्यापक डाॅ. सुभाष चंद्र मंुडा ने इसके संघषर्पूण दास्ता को आज के पीढ़ी को याद रखने एवं बतलाने की आवश्यकता पर बल दिया। कुड़मालि के विभागाध्यक्ष डाॅ. पी. पी. महतो ने बीर वुधु भगत के ऐतिहासिक एवं साहसपूण वीरता को जिक्र करते हुए कहा कि ऐसे कायर्क्रम से हमारे बच्चों के बीच कमर्ठता का भाव जगता है।
बताते चले कि वीर बुधु का जन्म वतर्मान झारखंड के रांची जिला स्थित चान्हों प्रखंड के शिलागाईं गांव में 17 फरवरी 1792 ई. को किसान परिवार में हुआ है। इन्होंने कम उम्र से ही दमनकारी अंग्रेजी हुकुमतों के खिलाफ लोगों को संघर्ष करने को प्रेरित करते थे। वे कोल विद्रोह के महानायक के रूप में झाड़खंडी जनजीवन में जाने जाते हैं। ये 1832 को शहीद हुए। इसके बारे में बताया जाता है वे अंग्रेजों के हाथों मरने से अच्छा स्वयं को मार देना उचित समझा और वे अपने ही तलवार से अपना गदर्न धड़ से अलग कर लिया।
इस अवसर पर कई विभाग के शिक्षक जिनमें नागपुरी के डाॅ. मनोज कच्छप, डाॅ. मालती बागिशा लकड़ा, कुड़मालि के डाॅ. निताई चंद्र महतो, कुँड़ुख़ के डाॅ. सिता कुमारी, सुश्री सुनिता कुमारी, खड़िया सुश्री शांति केरकेट्टा, संताली के डाॅ. डुमनी माई मुमूर्, मुंडारी के डाॅ. दसमी ओडे़या के अलावे कई विभाग के सैंकड़ों की संख्या मंे छात्र-छात्राएं उपस्थित थे।
कायर्क्रम का मंच संचालन हो विभाग के डाॅ. जय किशोर मंगल एवं धन्यवाद ज्ञापन कुड़ुख़ के सहायक प्राध्यापक सुश्री सुनिता कुमारी ने की। इस अवसर पर डाॅ. रामकिशोर भगत द्वारा संपादित एवं कुड़ुख़ विभाग के सहायक प्राध्यापक डाॅ. सीता कुमारी, डाॅ. रीना कुमारी एवं संजु लकड़ा सह संपादित किया हुआ पुस्तक ‘वीर पानी’ का लोकापर्ण अतिथियों द्वारा किया गया।




