रांची, झारखण्ड | अक्टूबर | 19, 2022 :: लगातार मौसम के बिगड़े मिजाज की बजह से दीपावली की रौनक फिर से बिगड़े के आसार नजर आ रहे है।
लगातार मौसम का सीधा असर दीपावली के अवसर पर मिट्टी से बनाने खिलौने,दीया और तरह तरह के सामान वाले कुंभकार पर ही अधिक पड रहा है।
दशहरा से अब तक लगातार बारिश हो रही है।इस अवधि से ही मिट्टी के सामान बनाने का काम कुंभकार शुरू करते है।पिछले दो बर्ष त करोना ने अपने कहर का शिकार बनाया ही था।
इस बर्ष कुछ उम्मीद जगी थी जिसे इन्द्र देव ने अपना कोप बरपा कर समाप्त कर रहे है।
बारिश के कारण कुंभकार मिट्टी के सामान तैयार नही कर पा रहे और न तैयार माल का आग मे पकाने की प्रक्रिया पुरी हो पा रही है।
मिट्टी के स्वदेशी दीया का भी बाजार फीका फीका चल रहा है।
स्वदेशी के स्थान पर चायनीज सामग्री बाजार मे स्थान ले रही है।
लोग चायनीज सामग्री को चमक दमक के कारण पहली पसंद बन रही है।दीपावली के अक्सर पर लक्ष्मी गणेश जी की मुर्ति त हर घर मे खरीदी जाती है।झारखंड मे कुछ कुंभकार ही बचे है जो लक्ष्मी गणेश की अब मुर्ति बना रहे है।स्वदेशी मुर्ति बनारस से अथवा राजस्थान से ही आ रहे है।
दोनो जगह सफेद मिट्टी प्राप्त होते है।
इसलिए सस्ते दामो पर लोग थोक के भाव मे पहले ही आर्डर कर मंगा लेते है।
झारखंड मे लगभग हर जिले मे इनकी अच्छी बाजार बन गई है।अधिकांश कुंभकार अपने मूल धंधे को छोड़कर इसको अपना लिया है।
कुंभकार परिवार की बदहाली और निर्धनता का मुख्य कारण मिट्टी का अभाव और सरकार की ओर से इस ओर ध्यान नही दिया जाना भी एक कारण है।
झारखंड के लाखो कुम्हार ने अपना मूल व्यवसाय त्याग कर दुसरे धंधे को अपना लिया है।अब लोग मिट्टी के काम करने से मुंह मोड रहे है।
एक समय था जब देश विदेश तक के घरो मे यहा तैयार होने वाले दीया,खिलौने आसानी से पहुंच जाते ,अब यह सिमटकर मुहल्ला तक रह गया है।
लोग आधुनिक रूप मे तैयार चीज को लेना पंसद करते है।शुद्धता और स्वदेशी को लोग भूल रहे है। और त और लोग अपने घर के आगे प्लास्टिक के फुल और केला का पौधा लगा कर पुजा पाठ करते है।
इस बार मॉनसून के लगातार बने रहने से कुम्हार परिवार मे चिन्ता अधिक देखी जा रही है।
जिस परिवार ने साल भर की रोटी के लिए ब्याज पर पैसा लेकर थोक बाजार से जो खरीद किया था उसके बिक्री पर भी संदेह की लकीर पडती नजर आ रही है।
अब यदि माल नही बिका त थोक बिक्री करने बाले सुद दर सुद की वसूली करेगे ।
झारखंड मे कुंभकार परिवार की हालात अत्यन्त दयनीय है।लगभग अस्सी प्रतिशत कुम्हार परिवार ने अपना पुस्तैनी धंधा को त्याग कर दूसरे व्यवसाय को अपना लिया है।
रिपोर्ट :: देवेंद्र शर्मा




