आलेख़

आत्महत्या :: अर्पणा सिंह रांची

 

आत्महत्या
दिल दहल जाता
मन में प्रश्नों का हलचल चलता
कितना ये कठिन समय होगा
जब तुमने ये निर्णय लिया होगा
मन कितना व्यथित होगा
कितने घाव सहे होंगे
कितने दर्दों को छिपाया होगा
किस बात की चूभन
मन को बेचैन की होगी
व्यथित मन कितना घबराया होगा
दिल कितना तड़पा होगा
जब अपनो से जुदा होने का
तुमने सोचा होगा
मन तन को कितना कठोर बना
खुद को मतलबी दुनिया से
परे होने का गलत निर्णय लिया होगा
दुनिया लाख बुरी हो
अपनों से तो दर्द को साझा किया होता
लाखों अच्छे कर्मों के बाद
जो मानव जीवन पाया था
उसे यूँ ही न गवाया होता
जो उलझनें सुलझ सकती थी
अपनों संग मिल सुलझाया होता
हताश होने के वजाय परिवार का
सहयोग पा अपनी नयी पहचान बनाया होता
हे मानव जब मन घबराये
कोई हल न मिल पाये
कर सुदृढ़ विश्वास अपने उपर न यूँ गवा खूबसूरत जीवन
जिंदगी को एक नयी उड़ान दो
आत्महत्या के बदले आत्मबल को भर
बिखरती जीवन को खुशनुमा बना
दूसरों के लिए प्रेरणा बन मुस्कुरा ।

अर्पणा सिंह रांची
झारखंड

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