vat savitri
झारखण्ड राष्ट्रीय

वट सावित्री व्रत की कथा

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रांची, झारखण्ड । मई  | 21, 2017 :: वट सावित्री-व्रत ( बरगदआई , बरसतिया )-2017

24 मई बुधवार  को नहान खाए होगा , क्यो कि इस दिन त्रयोदशी और चतुर्दशी दोनो है ,गुरूवार  25 मई को अमावस है ,सुबह 3:54 से रात 1:30 तक है ,इस दिन शनि महाराज की जयन्ती ,सावित्री अमावश्या ( उडिया)  फलहारिणी कालिका पूजा (बँगाल) मे है ,

आगामी 4 जून को गंगा दशहरा,  5 जून को निर्जला एकादशी है ,

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वटसावित्री व्रत :

वातावरण में विद्यमान हानिकारक तत्त्वों को नष्ट कर वातावरण को शुद्ध करने में वटवृक्ष का विशेष महत्त्व है । वटवृक्ष के नीचे का छायादार स्थल एकाग्र मन से जप, ध्यान व उपासना के लिए प्राचीन काल से साधकों एवं महापुरुषों का प्रिय स्थल रहा है । यह दीर्घ काल तक अक्षय भी बना रहता है। इसी कारण दीर्घायु, अक्षय सौभाग्य, जीवन में स्थिरता तथा निरन्तर अभ्युदय की प्राप्ति के लिए इसकी आराधना की जाती है ।

वटवृक्ष के दर्शन, स्पर्श तथा सेवा से पाप दूर होते हैं; दुःख, समस्याएँ तथा रोग जाते रहते हैं । अतः इस वृक्ष को रोपने से अक्षय पुण्य-संचय होता है । वैशाख आदि पुण्यमासों में इस वृक्ष की जड में जल देने से पापों का नाश होता है एवं नाना प्रकार की सुख-सम्पदा प्राप्त होती है ।

इसी वटवृक्ष के नीचे सती सावित्री ने अपने पातिव्रत्य के बल से यमराज से अपने मृत पति को पुनः जीवित करवा लिया था । तबसे ‘वट-सावित्री नामक व्रत मनाया जाने लगा । इस दिन महिलाएँ अपने अखण्ड सौभाग्य एवं कल्याण के लिए व्रत करती हैं ।

व्रत-कथा : सावित्री मद्र देश ( चैन्न ई ) के राजा अश्वपति की पुत्री थी । द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान से उसका विवाह हुआ था । विवाह से पहले देवर्षि नारदजी ने कहा था कि सत्यवान केवल वर्ष भर जीयेगा । किंतु सत्यवान को एक बार मन से पति स्वीकार कर लेने के बाद दृढव्रता सावित्री ने अपना निर्णय नहीं बदला और एक वर्ष तक पातिव्रत्य धर्म में पूर्णतया तत्पर रहकर अंधे सास-ससुर और अल्पायु पति की प्रेम के साथ सेवा की । वर्ष-समाप्ति  के  दिन  सत्यवान  और  सावित्री समिधा लेने के लिए वन में गये थे । वहाँ सत्यवान बेहोश  होकर गया । यमराज आये और सत्यवान के सूक्ष्म शरीर को ले जाने लगे । तब सावित्री भी अपने पातिव्रत के बल से उनके पीछे-पीछे जाने लगी । यमराज द्वारा उसे वापस जाने के लिए कहने पर

सावित्री बोली :
‘‘जहाँ जो मेरे पति को ले जाय या जहाँ मेरा पति स्वयं जाय, मैं भी वहाँ जाऊँ यह सनातन धर्म है।

सावित्री के वचनों से प्रसन्न हुए यमराज से सावित्री ने अपने ससुर के अंधत्व-निवारण व बल-तेज की प्राप्ति का वर पाया । तथा  सत्यवान  को  मृत्युपाश से मुक्त करा लिया।

व्रत-विधि : इसमें वटवृक्ष की पूजा की जाती है । विशेषकर सौभाग्यवती महिलाएँ श्रद्धा के साथ ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी से पूर्णिमा तक या कृष्ण त्रयोदशी से अमावास्या तक तीनों दिन अथवा मात्र अंतिम दिन व्रत-उपवास रखती हैं । यह कल्याणकारक  व्रत  विधवा,  सधवा,  बालिका, वृद्धा, सपुत्रा, अपुत्रा सभी स्त्रियों को करना चाहिए ऐसा ‘स्कंद पुराण में आता है।
संकल्प करें कि ‘मैं मेरे पति और पुत्रों की आयु, आरोग्य व सम्पत्ति की प्राप्ति के लिए एवं जन्म-जन्म में सौभाग्य की प्राप्ति के लिए वट-सावित्री व्रत करती हूँ ।
वट  के  समीप  भगवान  ब्रह्माजी,  उनकी अर्धांगिनी सावित्री देवी तथा सत्यवान व सती सावित्री के साथ यमराज का पूजन कर ‘नमो वैवस्वताय “” इस मंत्र को जपते हुए वट की परिक्रमा करें । इस समय वट को १०८ बार या यथाशक्ति सूत का धागा लपेटें ।

विशेष निवेदन –  अपने पति – परिवार के दीर्घायु जीवन के लिये बरगद का एक पेड़ जरूर लगायें ।
@ पिया की लंबी उम्र की कामना लेकर प्रकट हुआ वटशावित्री

आज वट वृक्ष को मिलेगा नेवता, होगी संजत

पिया की लंबी उम्र व उनकी कुशल जीवन की कामना के लिए मनाया जाने वाला वटसावित्री व्रत गुरूवार को नहाय खाय के साथ शुरू हो गया  | इसके साथ ही अगले तीन दिनों तक सुहागिने धर्म और आस्था मे डुबी रहेंगी |
संजत ( वटवृक्ष का आवाह्न ) की जायेगी | अहले सुबह स्नान- ध्यान से निवृत हो कर शुद्ध घी का भोजन सेवन करेंगी और संध्या मे वट वृक्ष के पास जाकर घी का दीपक प्रज्वलीत कर व्रत और वट वृक्ष कावआवाह्व करेंगी |  शनिवार को पूजन, अर्चन एवं वट वृक्ष की परिक्रमा की जायेगी |
ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या तिथि को मनाया जाने वाला यह व्रत सुहागिन  महिलाएं  रखती हैं । शास्त्रों के अनुसार इस दिन व्रत रखकर वट वृक्ष के नीचे सावित्री, सत्यवान और यमराज की पूजा करने से पति की आयु लंबी होती है और संतान सुख प्राप्त होता है | मान्यता है कि इसी दिन सावित्री ने यमराज के फंदे से अपने पति सत्यवान के प्राणों की रक्षा की थी | भारतीय धर्म शास्त्र में वट सावित्री अमावस्या स्त्रियों का महत्वपूर्ण पर्व है | इस दिन वट ( बड़, बरगद ) वृक्ष का पूजन होता है | इस व्रत को स्त्रियां अखंड सौभाग्यवती रहने की मंगलकामना से करती हैं | इस व्रत में सबसे अधिक महत्व चने का है | बिना चने के प्रसाद के यह व्रत अधूरा माना जाता है।
स्कन्दपुराण में कहा गया है- वट वृक्ष की जड़ों में ब्रह्मा जी, तने में विष्णु और डालियों एवं पत्तों में शिव का वास होती है | इसके नीचे बैठकर पूजन, व्रत कथा कहने और सुनने व परिक्रमा करने से पति लम्बी उम्र एवं पुत्र की मनोकामना पूरी होती है | अग्निपुराण के अनुसार बरगद उत्सर्जन को दर्शाता है | इसीलिए संतान के लिए इच्छित लोग इसकी पूजा करते हैं | शास्त्रों में कहा गया है कि बड़ अमावश्य के दिन वट वृक्ष की पूजा से सौभाग्य एवं स्थायी धन और सुख-शांति की प्राप्ति होती है |

सावित्री ने की थी सबसे पहले वट वृक्ष की पूजा

सत्यवान की रक्षा के लिए शावित्री ने ही सबसे पहले वट वृक्ष की पूजा की थी |
इसी दिन  सावित्री ने यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण की रक्षा के लिए यह व्रत धारण किया था | सावित्री और सत्यवान की कथा से वट वृक्ष का महत्व और पूजा का प्रकार विक्सित हुआ है | तब उसने  इसी वट वृक्ष के नीचे  सत्यवान को अपनी शाखाओं और शिराओं से घेरकर जंगली पशुओं से उनकी रक्षा की थी |  मान्यता है कि इस दिन शनि देव की कृपा पाने के लिए  वट वृक्ष की जड़ों को दूध और जल से अभिषेक करने से त्रिदेव प्रसन्न होते हैं  और शनि का प्रकोप कम होता है ।
स्कंद पुराण तथा भविष्योत्तर पुराण के अनुसार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को वट सावित्री व्रत करने का विधान है, वहीं निर्णयामृत आदि के अनुसार ज्येष्ठ मास की अमावस्या को यह व्रत करने की बात कही गई है। तिथियों में भिन्नता होते हुए भी व्रत का उद्देश्य एक ही है सौभाग्य की वृद्धि और पतिव्रत के संस्कारों को आत्मसात करना।

वट देव वृक्ष है। वट वृक्ष के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु तथा अग्रभाग में शिव रहते हैं। देवी सावित्री भी वट वृक्ष में रहती हैं।

वट वृक्ष के नीचे सावित्री ने अपने पति को पुन: जीवित किया था। तब से यह व्रत ‘वट सावित्री’ के नाम से जाना जाता है। इसमें वट वृक्ष की पूजा की जाती है। महिलाएं अखण्ड सौभाग्य एवं परिवार की समृद्धि के लिए यह व्रत करती हैं। व्रत की परिक्रमा करते समय एक सौ आठ बार या यथाशक्ति सूत लपेटा जाता है। साड़ी पर रुपया रखकर बायने के रूप में सास को देकर आशीर्वाद लिया जाता है। महिलाएं सावित्री सत्यवान की कथा सुनती हैं। सावित्री की कथा को सुनने से सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण होते हैं और विपत्तियां दूर होती हैं।

वट सावित्री व्रत कथा
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मद्र देश के राजा अश्वपति ने पत्नी सहित सन्तान के लिये सावित्री देवी का विधी पूर्वक व्रत तथा पूजन करके पुत्री होने का वर प्राप्त किया सर्वगुण सम्पन देवी सावित्री ने पुत्री के रूप में अश्वपती के घर कन्या के रूप में जन्म लिया ।

कन्या के युवा होने पर अश्वपती ने अपने मंत्री के साथ सावित्री को अपना पती चुनने के लिये भेज दिया। सावित्री ने अपने मन के अनुकूल वर का चयन कर के लोटी तो उसी दिन देवर्षि नारद उनके यहा पधारे। नारद के पूछने पर सावित्री ने कहा महाराज धुमत्य सेन के पुत्र सत्यवान की कीर्ति सुनकर उन्हें मैंने पति रूप में वरन कर लिया है । नारदजी ने सत्यवान तथा सावित्री के ग्रहों की गणना कर अश्वपती को बधाई दी तथा सत्यवान के गुणों की भुरी भुरी प्रसंसा की और बताया की सवेत्री के बारह वर्ष की आयु होने पर सत्यवान की मृत्य हो जायेगी नारद की बात सुनकर राजा अस्वपती का चहरा मुरझा गया उन्होंने सावित्री से किसी अन्य को अपना पती चुनने की सलहा दी परन्तु सावित्री ने उतर दिया आर्य कन्या होने के नाते जब में सत्यवान का वरन कर चुकी हू तो अब वे चाहे अल्पायु हो या द्रिघायु में किसी अन्य को अपने हृदय में स्थान नही दे सकती ।

सावित्री ने नारदजी से सत्यवान की मुत्यु का समय ज्ञात कर लिया। दोनों को विवाह हो गया। सावित्री अपने श्वसुर परिवार के साथ जंगल में रहने लगी तथा नारदजी द्वारा बताये हुए दिन से तीन दिन पूर्व से ही सावित्री ने उपवास शुरु कर दिया । नारद द्वारा निश्चत तिथी को जब सत्यवान लकड़ी काटने के लिया चला तो सास स्वसुर से आज्ञा लेकर वह भी सत्यवान के साथ चल दी । सत्यवान वन में पहुचकर लकड़ी कटाने के लिये वृक्ष पर चढ़ा। वृक्ष पर चड़ने के बाद उसके सीर में भयंकर पीड़ा होने लगी तो वह नीचे उतरा | सावित्री ने उसे बड के पेड़ के नीचे लिटा कर उसका सिर अपनी गोद पर रख लिया | देखते ही देखते यमराज ने ब्रह्मा के विधान की रूप रेखा सावित्री के सामने स्पस्ट की ओर सत्यवान के प्राणों को लेकर चल दिये (कहीं –कही ऐसा भी उल्लेख मिलता है की वट वृक्ष के नीचे लेटे हुए सत्यवान को सर्प ने डस लिया था ) ।

सावित्री सत्यवान को वट वृक्ष के नीचे ही लिटाकर यमराज के पीछे –पीछे चल दी | पीछे आती हुई सावित्री को यमराज ने उसे लोट जाने का आदेश दिया | इस पर वह बोली महाराज जहां पति वही पत्नी | यही धर्म है, यही मर्यादा है | सावित्री की धर्म निष्टा से प्रसन्न होकर यमराज बोले पति के प्राणों के अतिरिक्त कुछ भी माँग लो | सावित्री ने यमराज से सास –श्वसुर के आखों की ज्योति और द्रिघायु माँगी | यमराज तथास्तु कहकर आगे बढ़ गये | सावित्री भी यमराज का पीछा करती रही ।

यमराज ने अपने पीछे आती सावित्री से वापिस लोट जाने को कहा तो सावित्री बोली पति के बिना नारी के जीवन की कोई सार्थकता नही | यमराज ने सावित्री के पति व्रत धर्म से खुश होकर पुनः वरदान माँगने के लिये कहा इस बार उसने अपने श्वसुर का राज्य वापिस दिलाने की प्राथना की तथास्तु कहकर यमराज आगे चल दिये | सावित्री अब भी यमराज के पीछे चलती रही इस बार सावित्री ने यमराज से —————————-

सो पुत्रों की माँ बनने का वरदान माँगा | तथास्तु कहकर जब यमराज आगे बढ़े तो सावित्री बोली आपने मुझे सो पुत्रों का वरदान दिया है, पर पति के बिना मै माँ किस प्रकार बन सकती हूँ । अपना यह तीसरा वरदान पूरा कीजिए । सावित्री की धर्मनिष्ठा, ज्ञान, विवेक तथा पतिव्रत धर्म की बात जानकर यमराज ने सत्यवान के प्राणों को अपने पाश से स्वतंत्र कर दिया | सावित्री सत्यवान के प्रणों को लेकर वट वृक्ष के नीचे पहुची जहा सत्यवान का मृत शरीर रखा था | सावित्री ने वट वृक्ष की परिक्रमा की तो सत्यवान जीवित हो उठा |

प्रसन्नचित सावित्री अपने सास –श्वसुर के पास पहुची तो उन्हें नेत्र ज्योती प्राप्त हो गई | इसके बाद उनका खोया हुआ राज्य भी उन्हें मिल गया | आगे चलकर सावित्री सो पुत्रों के माता बनी इस प्रकार चारों दिशायें सावित्री के पतिव्रत धर्म के पालन की कीर्ति से गूंज उठीं |
विधि – विधान
वट की परिक्रमा करते समय एक सौ आठ बार या यथा शक्ति सुत लपेटा जाता है।

‘नमो वैवस्वताय’

इस मन्त्रसे वटवृक्षकी प्रदक्षिणा करनी चाहिये। सावित्रीको अर्घ्य देना चाहिये और वटवृक्षका सिंचन करते हुए अपने सौभाग्य की प्रार्थना करनी चाहिये। चने पर रुपया रखकर बायनेके रुपमें अपनी सासको देकर आशीर्वाद लिया जाता है। सौभाग्य-पिटारी और पुजा सामग्री किसी योग्य ब्राह्मणको दी जाती है।
संकल्प मंत्र –

‘‘मम वैधव्यादि-सकलदोषपरिहारार्थं सत्यवत्सावित्रीप्रीत्यर्थं च वटसावित्री व्रतमहं करिष्ये।’’

पूजा एवं प्रार्थना मंत्र  –

‘‘अवैधव्यं च सौभाग्यं देहि त्वं मम सुव्रते। पुत्रान् पौत्रांश्च सौख्यं च गृहाणाघ्र्यं नमोऽस्तु ।।

पँ  रामदेव पाण्डेय- राची झारखण्ड,   8877003232

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