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देशभर के 26 साहित्यकार-कलाकार 7 मई को अखड़ा के महासम्मेलन में सम्मानित होंगे

रांची, झारखण्ड । मई  | 03, 2017 :: झारखंड और देशभर के 26 साहित्यकार-कलाकार 7 मई को अखड़ा के महासम्मेलन में सम्मानित होंगे। सम्मानित होने वालों में इंदौर (मप्र) की सुशीला धुर्वे, असम के तेलस्फोर इंदवार, जलपाईगुड़ी (प. बंगाल) के रविन्द्रनाथ सोरेन और विमल कुमार टोप्पो प्रमुख हैं। इनके अतिरिक्त जामताड़ा के भूजेन्द्र ‘आरत’, खूंटी के वयोवृद्ध फणीन्द्रनाथ माझी और बलदेव मुंडा, मेघनाथ तथा रांची के पीटर पौल एक्का,  और डा. गिरिधारीराम गौंझू अखड़ा सम्मान 2017 पाने वाले बहुचर्चित लेखक और फिल्मकार हैं।
जामताड़ा के 77 वर्षीय भूजेन्द्र ‘आरत’ और हासा गांव खूंटी के 88 वर्षीय फणीन्द्रनाथ माझी को अखड़ा के चौथे महासम्मेलन में विशेष तौर पर सम्मानित किया जाएगा। संताल हूल और आदिवासियों पर कहानियां-उपन्यास लिखने वाले भूजेन्द्र नारायण प्रसाद ‘आरत’ हिंदी में पहले लेखक हैं। वहीं 1930 में जन्मे फणीन्द्रनाथ माझी पद्मश्री रामदयाल मुंडा जैसों के गुरु रहे हैं और इन्होंने साहित्य की सभी विधाओं में लेखन किया है। इन दोनों के साथ ही रांची के उपन्यासकार पीटर पौल एक्का और डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर मेघनाथ को भी अखड़ा का विशेष सम्मान प्रदान किया जाएगा। इसके अतिरिक्त झारखंड की आदिवासी और क्षेत्रीय भाषाओं के 21 झारखंडी भाषाविदों, साहित्यिकारों और कलाकारों को उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए पुरस्कृत किया जाएगा। यह घोषणा आज झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा की महासचिव वंदना टेटे और अध्यक्ष डा. करमचंद्र अहीर ने रांची में संयुक्त रूप से की।
वंदना टेटे और डा. अहीर ने बताया कि हिंदी साहित्य में संताल जनजीवन और इतिहास को आधार बनाकर 1940 में सारठ, देवघर में जन्मे भूजेन्द्र नारायण प्रसाद ने विपुल लेखन किया है। सिर्फ संताल हूल पर उनके तीन उपन्यास हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने कई कहानियां भी लिखी हैं। लेकिन हिंदी साहित्य में ‘आरत’ के इस महत्वपूर्ण साहित्यिक योगदान को रेखांकित नहीं किया गया। इसी तरह खूंटी में शिक्षक रहे फणीन्द्रनाथ माझी उन शुरुआती लेखकों में से हैं जिन्होंने कहानियां, कविताएं और झारखंडी समाज पर अनेकों रिपोर्ताज लिखे। उनके रिपोर्ताज फणीश्वरनाथ रेणु की याद दिलाते हैं। हिंदी साहित्य ने श्री माझी को भी अनदेखा किया। पीटर पौल एक्का ने भी अपनी कहानियां और उपन्यास हिंदी में लिखा। ‘जंगल के गीत’ और ‘पलाश के फूल’ के उनके बहुचर्चित हिंदी उपन्यास हैं। जबकि मेघनाथ ने झारखंड के आदिवासी जनसंघर्षों को दुनिया तक पहुंचाने के लिए सिनेमा को अपना माध्यम बनाया। बिजू टोप्पो के साथ मिलकर बनाई गई उनकी कई डॉक्यूमेंट्री फिल्में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत और सराही गई हैं।
झारखंडी भाषाओं के लिए सम्मानित होने वाले साहित्यकार और संस्कृतिकर्मी हैं – चैत टोप्पो और सुखनी असुर (असुर भाषा), नगु बिरजिया (मरणोपरांत, बिरजिया संस्कृति), भोलानाथ गागराई और तिलक बारी (हो भाषा), तेलस्फोर इंदवार (असम) और राजेश डुंगडुंग (खड़िया भाषा), मो. सिराजुद्दीन अंसारी ‘सिराज’ और महेन्द्रनाथ गोस्वामी ‘सुधाकर’ (खोरठा भाषा), अधिकांत महतो और शक्तिपदो महतो (कुड़मालि भाषा, प. बंगाल), बासुदेव राम खलखो और विमल कुमार टोप्पो (कुड़ुख भाषा), जुनास कंडुलना (मरणोपरांत) और बलदेव मुंडा (मुंडारी भाषा), डा. गिरिधारी राम गौंझू ‘गिरिराज’ और डा. भुवनेश्व ‘अनुज’ (नागपुरी भाषा), बूटन देवी और राजकिशोर सिंह (पचपरगनिया भाषा), रविन्द्रनाथ सोरेन और दिलीप मुर्मू (संताली भाषा)।
मराठी के सुप्रसिद्ध आदिवासी साहित्यकार श्री वाहरू सोनवणे, बहुजन साहित्यकार और पूर्व सांसद प्रेमकुमार मणि, सुप्रसिद्ध आलोचक और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डा. चौथीराम यादव इन सभी लेखको-कलाकारों को ‘‘अखड़ा’ के चौथे महासम्मेलन के दूसरे दिन 7 मई 2017 को सम्मान प्रदान करेंगे।

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